
ऋषिकेश: उत्तराखंड में मूल निवासियों के हकों और मजबूत भू-कानून की मांग को लेकर एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। ऋषिकेश में आयोजित इस महारैली में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से हजारों लोग पहुंचे। ‘मूल निवास, भू-कानून समन्वय संघर्ष समिति’ के आह्वान पर आयोजित इस रैली में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों के साथ-साथ पूर्व सैनिकों और कर्मचारियों ने भी भाग लिया।
मूल मुद्दे:
- मूल निवास: प्रदर्शनकारियों की मांग है कि उत्तराखंड में मूल निवासी का दर्जा पाने के लिए 1950 को कट-ऑफ वर्ष माना जाए।
- भू-कानून: वे चाहते हैं कि राज्य में जमीन की खरीद-फरोख्त पर सख्त कानून बनाए जाएं ताकि बाहरी लोगों द्वारा जमीनों पर कब्जा न हो सके।

आंदोलनकारियों की चिंताएं:
- आर्थिक असमानता: प्रदर्शनकारी मानते हैं कि बाहरी लोगों के आने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कम हो गए हैं।
- सांस्कृतिक पहचान: उन्हें डर है कि बाहरी लोगों के आने से उनकी सांस्कृतिक पहचान खत्म हो जाएगी।
- प्राकृतिक संसाधनों का दोहन: वे चिंतित हैं कि बाहरी लोग प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं।
आगे की रणनीति:
संघर्ष समिति ने घोषणा की है कि वे पूरे प्रदेश में ‘स्वाभिमान यात्रा’ निकालेंगे और घर-घर जाकर लोगों को जागरूक करेंगे। उनका लक्ष्य है कि सरकार उनकी मांगों को माने और मूल निवासियों के हकों को सुरक्षित करे।
मुख्य मांगें:
- 1950 को मूल निवास का कट-ऑफ वर्ष घोषित किया जाए।
- शहरी क्षेत्रों में जमीन खरीदने की सीमा 200 वर्ग मीटर रखी जाए।
- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि की खरीद-फरोख्त पर प्रतिबंध लगाया जाए।
- सरकार द्वारा बेची गई या दान में दी गई जमीनों का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
- उद्योगों के लिए जमीन लीज पर दी जाए और स्थानीय लोगों को रोजगार दिया जाए।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में मूल निवासियों के हकों और भू-कानून को लेकर उठा यह आंदोलन राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करना होगा और एक ऐसा समाधान ढूंढना होगा जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो।