
देहरादून: उत्तराखंड में मूल निवास और भू-कानून को लेकर आंदोलन तेज हो गया है। मूल निवास, भू-कानून संघर्ष समिति के संयोजक मोहित डिमरी ने कहा कि ये कानून जनता की भावनाओं के अनुरूप होने चाहिए और विधानसभा में पारित होने से पहले सभी हितधारकों से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
डिमरी ने आरोप लगाया कि राज्य में जमीनों की लूट हो रही है और उद्योगों के नाम पर दी गई जमीनों का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि वर्ष 2022 में भू-कानून को लेकर बनी सुभाष कुमार कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
महत्वपूर्ण मांगें:
- मूल निवास: 30 साल से राज्य में रहने वाले व्यक्ति को घर बनाने के लिए 200 वर्ग मीटर तक जमीन मिलनी चाहिए।
- मलिन बस्तियां: मलिन बस्तियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए।
- उद्योग: उद्योगों में जमीन के मालिक की बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए और जमीन 10 साल की लीज पर दी जाए।
- कृषि भूमि: कृषि भूमि की खरीद पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
- शहरी क्षेत्र: शहरी क्षेत्रों में निकायों का विस्तार रोका जाए।
आंदोलन की रणनीति:
संघर्ष समिति ने केदारनाथ में स्वाभिमान महारैली आयोजित करने का फैसला किया है। इसके बाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसी रैलियां आयोजित की जाएंगी।
मुख्य मुद्दे:
- जमीनों की लूट: आरोप है कि राज्य में बड़े पैमाने पर जमीनों की लूट हो रही है।
- पारदर्शिता की कमी: उद्योगों के नाम पर दी गई जमीनों का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।
- कमजोर भू-कानून: मौजूदा भू-कानून को कमजोर बताया जा रहा है।
- मूल निवासियों के अधिकार: मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की मांग की जा रही है।
निष्कर्ष:
उत्तराखंड में भू-कानून को लेकर चल रहा आंदोलन राज्य के लिए महत्वपूर्ण है। यह आंदोलन जमीनों की लूट को रोकने, भू-कानून में सुधार और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहा है।
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