
देहरादून।
स्वच्छता पखवाड़ा 2025 (16 से 31 दिसंबर) के अंतर्गत आईसीएआर–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईसीएआर–आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून द्वारा 26 दिसंबर 2025 को संस्थान परिसर में पर्यावरणीय स्वच्छता हेतु अपशिष्ट जल शोधन एवं पुनर्चक्रण विषय पर एक जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संस्थान के वैज्ञानिकों, कर्मचारियों, प्रशिक्षु छात्रों एवं सॉयल कॉलोनी के निवासियों सहित कुल 45 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. एम. मुरुगानंदम, प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रभारी (पीएमई एवं केएम इकाई) ने जल शोधन, जल गुणवत्ता संरक्षण, अपशिष्ट जल निपटान एवं पुनर्चक्रण के पर्यावरणीय महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने संस्थान परिसर में आधिकारिक आवासों से उत्पन्न अपशिष्ट जल के उपचार हेतु स्थापित “जलोपचार” प्रणाली के कार्य सिद्धांत को समझाया।
डॉ. मुरुगानंदम ने बताया कि जलोपचार प्रणाली पौधा–सूक्ष्मजीव–मीडिया–रेत–पत्थर फिल्टर अंतःक्रिया पर आधारित एक प्रकृति-आधारित समाधान है, जो बिना हानिकारक रसायनों, बड़े फिल्टर या एरेटर के अपशिष्ट जल का प्रभावी उपचार करती है। उन्होंने Typha latifolia एवं Arundo donax जैसी पौध प्रजातियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये पौधे भारी धातुओं, घरेलू रासायनिक प्रदूषकों, नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्टों एवं सूक्ष्मजीवीय प्रदूषकों को हटाने में सहायक हैं।
डॉ. रामपाल ने जलोपचार प्रणाली के प्रमुख घटकों—मैक्रोफाइट्स, परतदार रेत–पत्थर फिल्टर मीडिया, इनलेट स्ट्रेनर, जल स्तर निगरानी इकाइयों एवं भंडारण टैंकों—की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पौधों और सूक्ष्मजीवों की संयुक्त भूमिका से अपशिष्ट जल से प्रदूषकों को प्रभावी ढंग से हटाया जाता है।
कार्यक्रम में डॉ. सादिकुल इस्लाम (वैज्ञानिक), अनिल के. चौहान (मुख्य तकनीकी अधिकारी), टी. एस. रावत (वित्त एवं लेखा अधिकारी), ब्रजेश जादौन (प्रशासनिक अधिकारी), आलोक खंडेलवाल (सहायक प्रशासनिक अधिकारी) सहित संस्थान के कर्मचारी एवं सॉयल कॉलोनी के निवासी उपस्थित रहे।
इस जागरूकता कार्यक्रम का समन्वय डॉ. एम. मुरुगानंदम द्वारा डॉ. रामपाल, अनिल के. चौहान, टी. एस. रावत एवं जॉर्डन के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य जल गुणवत्ता संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार तकनीकों और जल पुनर्चक्रण के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।
यह अभियान जल संकट की चुनौती से निपटने एवं सतत अपशिष्ट जल प्रबंधन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।


