भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने चार राज्यों – दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात को निर्देश दिया है कि वे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील अरावली पहाड़ियों में नए खनन पट्टों को जारी करने पर रोक लगा दें।

यह फैसला न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ए.एस. ओका की पीठ द्वारा दिया गया था। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह आदेश पहले से जारी किए गए वैध परमिटों और लाइसेंसों के तहत हो रही वर्तमान खनन गतिविधियों को प्रतिबंधित नहीं करता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने एक समिति के गठन का भी आदेश दिया है, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव, चारों राज्यों के वन सचिव, भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) और जियोग्राफिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के एक-एक प्रतिनिधि और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) का एक सदस्य शामिल होंगे। यह समिति दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपेगी।
इस फैसले का स्वागत पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं ने किया है, जो लंबे समय से अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन के खिलाफ लड़ रहे हैं। अरावली पहाड़ियाँ भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि यह पर्वतमाला वायु शुद्धिकरण और जलवाहन क्षेत्र के रूप में कार्य करती है।
यह फैसला इस बात का संकेत है कि भारत सरकार पर्यावरण संरक्षण को गंभीरता से ले रही है। उम्मीद की जाती है कि इससे अरावली पहाड़ियों के नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में मदद मिलेगी।

