
देहरादून: उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। मोर्चा ने दावा किया कि सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों से यह साबित हो गया है कि धामी सरकार ने खनन माफियाओं को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए नियमों में ढील दी।
मोर्चा के अनुसार, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 4 जुलाई 2021 को पदभार संभाला और इसके ठीक दो महीने बाद, 9 सितंबर को उनके “प्रिय अधिकारी” मीनाक्षी सुंदरम ने एक शासनादेश जारी किया। इस शासनादेश में कोविड-19 महामारी और “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” का हवाला देते हुए स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स के नवीनीकरण की प्रक्रिया को पूरी तरह से बदल दिया गया।
नियमों की धज्जियां
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि इस नए आदेश के तहत, नवीनीकरण के लिए आवेदन अब केवल एक स्व-प्रमाणित शपथपत्र पर आधारित कर दिए गए, जिसमें आवेदक को यह घोषणा करनी थी कि उसने सभी नियमों का पालन किया है। यह नीति केवल एक महीने के लिए लागू की गई थी, लेकिन इसने पारदर्शिता को पूरी तरह से खत्म कर दिया।
इससे पहले, नवीनीकरण की प्रक्रिया बेहद सख्त थी। इसमें फर्मों को प्रमाणित प्रोजेक्ट रिपोर्ट, पर्यावरण, वन और राजस्व विभागों से अनिवार्य अनुमति, और एक समिति द्वारा स्थल निरीक्षण, वीडियोग्राफी और ड्रोन फुटेज जमा करना होता था। मोर्चा ने आरोप लगाया कि धामी सरकार ने इन सभी सख्त प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया।
17 दिनों में 150 से ज्यादा नवीनीकरण
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि मुख्यमंत्री ने अपने एक और “प्रिय अधिकारी” राजपाल लेघा को नोडल अधिकारी नियुक्त किया। इसके बाद 21 सितंबर को एल.एस. पैट्रिक को नवीनीकरण की संस्तुति देने के लिए अधिकृत किया गया। नतीजतन, सिर्फ 17 दिनों में 150 से अधिक स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स को नवीनीकरण की अनुमति दे दी गई।
RTI से प्राप्त दस्तावेजों ने इस पूरी प्रक्रिया में कई अनियमितताओं को उजागर किया है:
- समान लिखावट: कई आवेदनों में एक जैसी लिखावट पाई गई, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि आवेदन कुछ चुनिंदा लोगों द्वारा ही भरे गए थे।
- अपूर्ण दस्तावेज़: कई प्लांट्स की पर्यावरणीय या वन विभाग की अनुमति समाप्त हो चुकी थी या थी ही नहीं।
- वन भूमि पर नवीनीकरण: वन विभाग द्वारा आरक्षित वन भूमि घोषित की गई जगहों पर भी नवीनीकरण कर दिया गया।
- स्वामित्व का अभाव: खसरा-खतौनी में स्वामित्व या लीज़ के प्रमाण नहीं थे।
- तेज़ गति से मंज़ूरी: कई मामलों में जिस दिन आवेदन भरा गया, उसी दिन जांच और संस्तुति भी कर दी गई।
चुनावी फंड के लिए भ्रष्टाचार के आरोप
मोर्चा ने दावा किया कि इस खेल में हर क्रेशर और प्लांट से 2 से 3 करोड़ रुपये की वसूली की गई, जिससे सिर्फ 17 दिनों में लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये का चुनावी फंड इकट्ठा किया गया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा गया, “यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की आत्मा पर किया गया डाका है।” मोर्चा ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को “खनन प्रेमी मुख्यमंत्री” बताते हुए आरोप लगाया कि उनकी सरकार जनता की नहीं बल्कि खनन माफियाओं की सरकार है। यह भी कहा गया कि नदियों, जंगलों और पहाड़ों को इस सरकार के तहत लूटा और बेचा गया है।